Friday, September 30, 2011

है साहिल

है साहिल पे बैठा,
लहरों को देखता हूँ,
हवा चलती है,
नमी पानी ले लेता हूँ,

अहसास यह फिजा का,
बहुत देर तक रहता नहीं,
साहिल से जब उठा,
ये भी पास आता नहीं,

अब शुष्क हवा,
चुभती देह में,
झुलसा जाती,
सोख पानी जाती,

कैसे-कैसे दिन बीते,
रात है फिर आती,
सारी-सारी जिन्दगी बीती,
ऋतुएं तो हैं आती-जाती,


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ऐसे सफाके

ऐसे सफाके प्यार से,
तुझे मैं क्या समझाऊँ,
तेरा इश्क भी तो है कितना कातिल,
तुझे कैसे मनाऊँ,

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आफरीन-ए-मोहब्बत

आफरीन-ए-मोहब्बत तेरी,
खुलूश-ए-गयास है तेरी,
न उफान ले ये जहमी,
न बने तू यूँ बहमी,

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उन्होंने गम

उन्होंने गम दिया,
तन्हाई भी दी,
क्या करें अब हम,
मोहब्बत हमने ही की,


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Thursday, September 29, 2011

जैसे-जैसे

जैसे-जैसे,
साफ़ हुआ,
मंज़र,
नज़र आयी,
एक हसीना,
पसीने में,
तरबतर,
शबाब-ए-हुश्न में,
डूबी हुयी,
तरासा-ए-खुदा का,
एक नगीना,

लटें वो,
सुलझा रही थी,
धूल वो,
झाड़ रही थी,
बेखबर-सी,
जल्दी-जल्दी,
अपने को,
साफ़,
कर रही थी,

आस-पास,
सबकी नज़र,
उस पर थी,
घूरते लोग थे,
नज़रें गड़ाकर,

उसको अहसास हुआ,
शर्म-शार हुयी,
दबे पाँव,
धीरे-से,
रुखसत हुयी,





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हकीकत-ए-वक्त

हकीकत-ए-वक्त से कुछ वक्त निकाल लेता हूँ,
कुछ इधर से निकाल लेता हूँ, कुछ उधर से निकाल लेता हूँ,
माजरा-ए-आलम वक्त गुजार कर लेता हूँ,
कुछ इधर गुज़ार लेता हूँ, कुछ उधर गुज़ार लेता हूँ,


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तनहा-सा खड़ा

यूँ ही तनहा-सा खड़ा था,
अपने गम में डूबा हुआ,
याद उसकी सताती थी,
उसी की याद में खोया हुआ,


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जख्मों को

यह मत पूँछ, जख्मों को क्यूँ, संभाल के रखा है,
अरे याद उसकी दिलाते हैं, तभी तो पाल रखा है,

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घबराते दिल

घबराते दिल से, बात करते हो,
कंपकपाते हैं ओंठ,  नज़रों से मिलते हो,


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Tuesday, September 27, 2011

बह गया

बह गया जो पानी, वो दरिया में फिर न पाओगे,
जिनको छोड़ा था, उनको किसी और के साथ पाओगे,
फिर दिल के ज़ज्बात में डूबे, और कहीं न जागोगे,
देखना हमारी याद के सहारे जिन्दगी बिताओगे,

खातिर तवज्जो आज याद ही गयी आखिर,
यूँ हमको ही फिर अपना बनाओगे आखिर,
किसी और के न बन पाओगे आखिर,
मेरे ही आगोश में आओगे आखिर,

किसने कहा की भुला दिया है तुमको,
यूँ क्यूँ अंदाज़ लगा लिया है तुमने,
अरे अपने दिल से पूछो,
क्या दिल से निकाल दिया है मुझको,



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जिगर-ए-हालत

जिगर-ए-हालत तू क्या जाने,
ज़ख्मों की बात तू क्या जाने,
नासूर हूँ मैं दिल का तेरे,
रिस-रिस कर रिश्ता ही रहूँगा,

इसी से रिश्ता बनाकर रखूँगा,
तुझे इसी तरह सताता रहूँगा,
तुझे इसी तरह जताता रहूँगा,
तुझे इसी तरह याद आता रहूँगा,


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चलो कदम

चलो कदम पे कदम धरो,
इश्क की खुदी पे कदम धरो,
डरो मत कुछ होगा नहीं,
हाँ पर तू खुद रहेगा नहीं,


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गोशे-गोशे

गोशे-गोशे वो सो रहे थे,
बत्ती हमने बुझा दी,
न जाने कब सुबह हो गयी,
हलके से उनकी नींद जगा दी,


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ये चले

ये चले हुश्न की परी के पीछे-पीछे,
वो उडती थी, ये दौड़ते थे,
उसको पा लाने का दम भरते-भरते,
न हाथ आयी वो, ये रो-रो पड़ते थे,

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सजा दो

सजा दो दरबार, आज हुश्न आनेवाला है,
हुश्न की रौशनी से, आज दरबार रौशन होनेवाला है,


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अब कुछ

अब कुछ ख़त लिखने दो,
खता हुयी जो उसकी सजा मिलने दो,
न माफ़ी अब मांगने दो,
सजा सारे जिन्दगी भुगतने दो,


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यूँ ही बैठे-बैठे

यूँ ही बैठे-बैठे,
एक दिन,
अचानक,
उसका ख्याल आया,

खोता-सा गया,
गोता-सा गया,
रोता-सा गया,
होता-सा गया,

उसकी वो सूरत,
लफ़्ज़ों में,
बयाँ करूँ,

गोल-गोल चेहरा,
मखमली मोहरा,
वो गदराया जिस्म,

उसका किसी से बतियाना,
अपनी तरफ खींच लेना,
बरबस उठकर,
उसका वो चल देना,

कितनी नजाकत से,
भरी थी वह,
चाल से परी,
लग रही थी वह,

उडती-सी चुनर,
उड़ते-से कदम,
धर रही थी वह,

वह चली गयी,
निगाहें भी न मिली,
जानो-जिस्म में,
उतर यूँ गयी,


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चलो अहसास

चलो अहसास-ओ-उल्फत तो हुयी,
उनके दिल में कुछ हरकत तो हुयी,
नज़रों से कुछ कहानी बयाँ तो हुयी,
यूँ मुलाक़ात की कुछ आस तो हुयी,


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आजमाते हो

आजमाते हो हुस्न को,
देखो ये किसी का नहीं होता,
देख लो आजमाकर,
हमेशा हुश्न बेवफा नहीं होता,


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जहान-ओ-जिज्बत

जहान-ओ-जिज्बत की जिन्दगी से,
अब आसरा एक आस से बाकी है,
तुम तो चली गयी छोड़कर गोचे से,
बस हमारी यादों का बासरा बाकी है,


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ये मासूम

ये मासूम हुश्न, निगाहों से कितनों का कत्ल कर देता है,
गवाह भी कहाँ से लायें, जख्म जो दिल में कर देता है,

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Monday, September 26, 2011

मत पूछ यार

मत पूछ यार,
आज क्या हुआ,

उसकी पड़ती-सी नज़र,
उसकी लगती-सी नज़र,
उसकी घुसती-सी नजर,
उसकी पलटी-सी नज़र,

काफी दिन के बाद,
नज़रें जो मिलीं थीं,
मेरे आने से,
सकपका वो गयी थीं,

काबू में उसका,
दिल-दिमाग न था,
नज़र कहीं तो,
दिमाग कहीं था,

दिल धडकता था,
उसका जोर-जोर से,
साँसें भी वह,
संभालती थी बड़ी मुस्किल से,

कभी-भीतर,
कभी बाहर,
चक्कर काटती थी,
मुझे भी ताकती थी,

पर क्या बताऊँ,
वहाँ भीड़ बहुत थी,
शक भरी निगाहें,
सब ओर थीं,

उसके भी रुतबे का,
ख्याल रखना था,
सरे आम उसको,
न बदनाम करना था,

उसने अपने दिल की,
दिल में रख ली,
मैंने भी अपने दिल की,
दिल में रख ली,

पर निगाहों ने हमारी,
बहुत-सी बातें कर ली,
कुछ उसने मेरी सुन ली,
कुछ मैंने उसकी सुन ली,

सुकून अब मिल गया,
दिल अब खुश हो गया,
आज उनका दीदार हो गया,
ख़त्म इंतज़ार हो गया,

हम तो सोचते थे,
वो यहाँ से चले गए होंगे,
क्या पता इस जिन्दगी में,
दीदार उनके दुबारा कब होंगे,

उनके चेहरे और आँखों से,
ऐसा महसूश हो रहा था,
उन पर भी इस मुलाक़ात से,
दिल-ए-सुकून झलक रहा था,

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उसने उधर

उसने उधर देखा,
फिर इधर देखा,
सड़क पार कर गयी,
लम्बे-लम्बे क़दमों से,
दूर वो निकल गयी,
पर उसका वो अंदाज़,
आज भी जहन में है,
उसकी वो अदा,
याद आज भी है,


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आफरीन आफताब

आफरीन आफताब की रौशनी,
से रौशन एक पारी आज दिखी,
क्या हुस्न था, क्या हसीना थी,
पर वो किसी और के साथ दिखी,


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घुटते-घुटते

घुटते-घुटते से पल, एक सांस लेना दूभर हो जाता है,
घुटनों के बल रहना पड़ता है, हर पल दूभर हो जाता है,


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जिस्म हमने

जिस्म हमने देखे नहीं आज तक,
लैला-मजनू, हीर-रांझा, सीरी-फरहाद, के,
पर रूहें उनकी जिन्दा हैं अभी तक,
कितनी पाकीदगी रही होगी इश्क में उनके,


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फुरफुरी-सी

वो नज़र से नज़र मिलने का अहसास,
बदन में फुरफुरी-सी दौड़ जाती है,
नज़र से नज़र मिलने पर,
नस-नस में खून-ए-दौरा बड़ा जाती है,

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Sunday, September 25, 2011

प्यार हो

यार से ही प्यार हो जाता है,
प्यासे को पानी ही पियाला जाता है,
पीते-पीते निगाह एक हो जाती है,
पर अब घड़े से कौन चुल्लू में पिलाता है,

कुँए अब ख़त्म हुए,
पनघट पर कौन अब जाता है,
प्यासा तो बेचारा अब भी है,
पर बोतल से पी लेता है,

निगाह न एक हो पाती है,
कोई पनिहारिन न मिल पाती है,
बिचारा आधे प्यार पर रह जाता है,
आधा प्यार न उसे मिल पाता है,
इसलिए प्यार अधुरा रह जाता है,

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मुझे तेरे

मुझे तेरे जिस्म से नहीं तुझसे मोहब्बत थी,
रूह-ए-आलम तुने अपना वादा जो है बदला,
साथ-साथ न गयी इंतज़ार न किया मेरा,
मेरे से पहले अपना जिस्म क्यूँ है बदला,


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दीवानगी रूह

ये दीवानगी रूह ही समझ सकती है,
जिस्म तो एक जरिया है, रूह न मर सकती है,


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चेहरा छुपकर

वो चेहरा छुपकर इस तरह भागे की,
जैसे नज़र हमारी लग गयी हो,
शर्म-ओ-हया से चेहरा छुपाया की,
जैसे हमारी न होना चाहती हो,


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रूहें जब

रूहें जब मिलती हैं,
निगाहें जब मिलती है,
वक्त कितना भी लगे,
पर मोहब्बतें सब मिलती हैं,


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दीदार न

दीदार न हो सकें, हुश्न की शहजादियों के,
तभी तो बादशाहों ने दीवारें बनाई हैं,


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चमकते सितारों

चमकते सितारों की रात में,
खुले आसमान के नीचे,
बैठा था मैं तन्हा,
सन्नाटा था चरों ओर,
घुप्प अँधेरी रात में,
बैठा था मैं तन्हा,
इतना अकेला,
कि गुफ्तगू करून किससे,
कोई न पास है,
बात करून किससे,
यूँ ही बैठे-बैठे,
इक रौशनी-सी होने लगी,
अब कुछ दिखने-सा लगा,
तन्हाई अब खोने लगी,


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उसकी नजाकत

आहें भरी तन्हाई में याद उसको किया,
कल जिससे नज़र मिली गौर उसकी नजाकत पर किया,


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गर नज़रें

यूँ गर नज़रें न मिलती तो,
उल्फत न होती,
मोहब्बत न होती,
तुम हमारी न होती,


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अब न हुश्न

अब न हुश्न-ओ-अफ्लायत की बात कर,
अब न जिस्म-ओ-जिस्मायत की बात कर,
देखे ज़माने गर दूर से हुश्न के नज़ारे,
अब न मोहब्बत की बात कर,


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नुवार-ए-नुक्ते

नुवार-ए-नुक्ते से, दिल से जीते हैं,
अक्ल की बात से, दूर रहते हैं,
दुनिया में यहीं-कहीं रहते हैं,
दिल-ए-दीवानगी के गम पीते हैं,


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इन आखों

इन आखों की सिफई गर पढ़ लो,
तो जन्नत नसीब होगी,
इसी जमीन पर यह हुश्न परी,
तेरी शरीक-ए-हयात होगी,


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गम होता

न गम होता तो, नगमा कौन कहता,
नग न आम होता, तो नगमा कौन कहता,
नग न पाने का तो गम है,
तभी तो गम में नगमा कहता है,


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उनके अंदाजों

कुछ उन पर,
कुछ उनके अंदाजों पर,
नजर यूँ चली जाती है,
रोकता हूँ बहुत,
पर नज़र फिसल ही जाती है,

जब नज़र से नज़र मिल जाती है,
तो गज़ब का अहसास दे जाती है,
जहां से महरूम हो जाते हैं,
आलम को अब भूल जाते हैं,


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नसीब होता

जीना किसी-किसी को नसीब होता है, किसी की बाहों में,
कोई घुट-घुट कर जीता है, जिन्दगी की राहों में,


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कहते-कहते

कुछ कहते-कहते रुक-सी गयी,
आँख मिलाते-मिलाते झेंप-सी गयी,
आगे आते-आते पलट-सी गयी,
फिर न जाने क्यूँ दौड़-सी गयी,

आज तक न समझ पाया, माजरा क्या था,
फिर कभी न मिल पाया, काजरा क्या था,


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आते-आते

पास आते-आते कदम रुक से जाते हैं,
क्यूँ वो अनजाने से दर से सहम से जाते हैं,


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जो दिल्लगी

कर गयी जो दिल्लगी, वो आज तक याद आती है,
अपनी न हो पायी, किसी और के साथ अब जाती है,


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ख़ुशी-ख़ुशी

यूँ ख़ुशी-ख़ुशी अब तो वक्त बिता रहे हो,
अच्छा है, किसी के काम तो आ रहे हो,
दे रहे उसे ख़ुशी, गम अपने छिपा रहे हो,
क्यूँ अपने दिये को, आसुओं से जला रहे हो,


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Thursday, September 22, 2011

उठती-सी नज़र


फ़क्त,
उठती-सी नज़र,
कुछ कह-सा गयी,
उसकी आखों की चमक,
कुछ कह-सा गयी,

दिया मेरे,
दिल को जला,
रोशनी,
अब हो सी गयी,

राह न दिखती थी तब,
अब तो कायनात रोशन हो गयी,
इस रोशन जहाँ में,
अब राहें बहुत हैं,
डर नहीं,
खौफ नहीं,
बाहें बहुत हैं,

वो सामने खड़ी है,
मंद-मंद मुस्कान लिए,
आखें खुली हैं,
तक रहीं मुझे,

कदम उठा,
धीरे से बड़ा,
तेजी से दौड़ा,
ठिठक गया,
अचानक,
कुछ ख्याल आया,
फिर वो जज्बा न बन पाया,

मुड़ा,
कदम वापिस रखे,
उसकी आखों की,
गमगीनी न देख पाया,
प्यार की जगह,
इज्ज़त का ख्याल आया,

कुछ दिन के बाद,
उसके घर,
शादी का पैगाम भिजवाया,
आज उसके साथ,
अपना घर बसाया,

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साफ-ओ-गम

है साफ-ओ-गम इस जिन्दगी में सबको,
तो क्या हँसना भूल जाएँ,
हँसते-हँसते क्यूँ न इस गम के पलों को,
ख़ुशी-ख़ुशी झेल जाएँ,


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हार गर

है हार गर जिन्दगी में,
तो जीत भी दूर नहीं,
थोडा और जोर लगाओ,
तो मीत भी दूर नहीं,


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सनम वो

सनम वो जहमत क्यूँ उठाते ही,
गुलाम हाज़िर है,
तलवार न उठाओ कलाई नाज़ुक है,
गर्दन हाज़िर है,


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ज़माने-ओ-अक्त

है ज़माने-ओ-अक्त से वक्त की कुछ तस्वीरें,
धुंधला-धुंधला-सी जाती हैं वक्त की कुछ लकीरें,
याद कर-कर के रुवाई-सी आती है,
धुंधली-धुंधली-सी कोई तस्वीर बन जाती है,


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सरोजा-ए-वक्त

है हर सरोजा-ए-वक्त का दामन न पकड़,
दीखता है क्या तुझे किसी का मन न पकड़,
बीते-बीते इस जिन्दगी को वक्त बहुत हो गया,
आज तक न रौब आया, रुतबा भी खो गया,


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दिल छुपा

निगाह-ओ-इसखरत से,
दिल छुपा लेता हूँ,
नज़र न लड़ता किसी से,
अंजुमन ताड़ लेता हूँ,


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टक्कर-ओ-जहमत

टक्कर-ओ-जहमत से थोडा गौर कर लो,
हम पर भी नज़र कर लो थोडा गौर कर लो,
न यूँ फेरों निगाहें, एक उसी से तो हैं आहें,
आरजुएँ पर  उससे हैं, न दूर करो राहें,


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Tuesday, September 20, 2011

तेरी सहफतों

तेरी सहफतों से अपनी मुद्दतों तक,
एक चीज़ न देख पाया,
तू रोज़ चली आती है, इसी गली से,
तुझे रोज़ न देख पाया,


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वो जज़्बात

न अब वो जज़्बात रहेंगे,
न अब वो बात रहेंगे,
न अब वो हालत रहेंगे,
न अब वो मुलाकात रहेंगे,


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इम्दियादे हकीकत

इम्दियादे हकीकत तुझे क्या बताऊँ,
क्या दिल है क्या जान है,
एक बार तू भी देख ले,
क्या दिल है, क्या जान है,


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सरे दरबार

सरे दरबार तुझसे इल्तजा कर बैठे,
बादशाह के सामने तुझे मोहब्बत का पैगाम दे बैठे,
अब सर कलम हो, की सूली मिले,
हम तो तुझसे सरे आम मोहब्बत कर बैठे,

इस शहजादियों से मोहब्बत इतनी आसान नहीं होती,
दिल तो होता है, पर पहचान नहीं होती,
कहाँ कब बदल जाएँ, ये किसी की नहीं होती,
खेल कर दिल से, दिल तोडना इनकी जाती हसरत होती,


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पास आते-आते

पास आते-आते,
वो रुक-सी जाती है,
न जाने वो,
क्यूँ तक-सी जाती है,
दिल के अरमाँ को,
ढक-सी जाती है,
फिर दूर निकल जाती है,

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हमसाया तेरे

हमसाया तेरे प्यार का, अब जो मिल गया है,
किस्मत बदल गयी है, मुकद्दर बदल गया है,


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Saturday, September 17, 2011

मज़ाक बना

अपने को मज़ाक बना दिया, दुनिया की नज़र में,
दुनिया ये सोचती है, पागल है, किसी के असर में,

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Friday, September 16, 2011

तेरे दिल

मर गए, मिट गए, तेरे दिल में बस गए,
गर तू अपना दिल भी चीरे, मर हम गए,
तो कैसी ये सिफातन होगी सनम,
दिल तुम्हारा था, बस हम गए सनम,


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Thursday, September 15, 2011

मेरी आरज़ू

कोई न था, बस मेरी आरज़ू थी,
तुझसे हो मुलाकात, तमन्ना थी,
तेरे दिल में मेरे लिए कुछ हुआ,
यूँ दिल तेरा बात करने को हुआ,

न रोकना अब इन जज्बातों को,
बहने देना इन अरमानों को,
दूर है तो क्या बात है,
दिल से दिल जुड़ा, यही बात है,

संग जब दिल धडकता है,
धडकते-धडकते बहुत कुछ कहता है,
हमारे अरमानों को एक करता है,
फिर न कहे भी सब पता चलता है,

यही तो मोहब्बत है, मेरी जान,
मोह में बंध कर चली गयी जान,
न छिपाना अब मुझसे मेरी जान,
जानता तो पहले था, तू ही है मेरी जान,


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कैसे रूहें

कैसे रूहें एक-दुसरे से जुडी होती हैं,
कैसे रूहें एक-दुसरे को खींच लेती हैं,
कैसे रूहें एक-दुसरे को पहचान लेती हैं,
कैसे रूहें एक-दुसरे के पास होती हैं,

अद्रश्य है यह सब, जब जुदा हो तो पता चलता है,

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जम्ज़ा-ए-मकलियत

जम्ज़ा-ए-मकलियत, हुश्न को इस तरह रुसवा तो न कर,
ये आये है पास तेरे, इसको इस तरह से रुखसत तो न कर,


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रोज़ इसी

सह्फन-ओ-अख्लियत, आरमान मेरा दिल में उतार ले,
रोज़ इसी तरह से मिलेंगे, वक्त ज़रा निकाल ले,


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निगाह तेरी

हम-ओ-अमज़ा, शर्म तुझे बहुत आती है,
निगाह तेरी झुक जाती है, गाल तेरे लाल कर जाती है,

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तो मोहब्बत

ऐसा तो मोहब्बत में हर बार होता है,
मासूक कहीं रहती है, आशिक कहीं रहता है,

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मेरे पहलू

यूँ न आओ मेरे पहलू में, जाने का फिर दिल न करेगा,
बैठ गए, गर एक बार, उठने का दिल न करेगा,


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क्यूँ सताते

ऐसे क्यूँ सताते हो, रोज़-रोज़ ख्वाबों में क्यूँ आते हो,
मिल लो एक बार रूबरू, रोज़ ख्वाबों में क्यूँ बतियाते हो,

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Wednesday, September 14, 2011

हमसे सफ्न

यूँ न हमसे सफ्न हो, जिन्दगी रूठ जायेगी,
दिल टूट जाएगा, जान निकल जायेगी,


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ये बरबादियों

ये बरबादियों का जहाँ, क्यूँ तुने बना लिया,
इसको तो दूर कर, ग़मों को क्यूँ अपना लिया,

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सहाले बाज़ार

है सहाले बाज़ार में,
वेवफा से रहते हैं,
कुछ वो खफा से रहते हैं,
कुछ हम खफा से रहते हैं,

दूरियाँ बढती गयी,
मजबूरियां बढती गयी,
जिन्दगी के सफ़र में,
मैंने इधर, वो उधर चली गयी,


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पूछो जमीनों

न पूछो जमीनों से,
की सूखा कब-कब देखा,
आसमान से प्यार न मिला,
रूखा-रूखा देखा,


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भरोसा यूँ

भरोसा यूँ था तेरे प्यार से,
इसलिए वफ़ा न कर पाया,
कल किसी और से,
प्यार करते हुए तुझे जो पाया,


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देख ज़माने

देख ज़माने की हकीकत से,
न हूरे इल्म पाया है,
देखते-देखते ज़माना,
बस रूहे इल्म पाया है,


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न मोहब्बत

देखो यूँ न मोहब्बत का आशियाना तोड़ो,
यह घराना यूँ न छोड़ो,
तिनका-तिनका दिल का जोड़ा है,
आशुओं की रस्सियों से हमने जोड़ा है,


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नज़र न

नज़र न की जिस्म पर, रूह कांप गयी,
नज़रों से नज़रें मिली, नज़रें भांप गयी,


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हुस्न कुछ

तू हुस्न कुछ, सफालियत से कहता है,
तेरी रूह कुछ कहती है, तेरा जिस्म कुछ कहता है,


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न चाहते

अब न चाहते हैं, किसी हुश्न को, किसी हसीना को,
अब तो खुदा को चाहते हैं, बहाते हैं पसीना को,


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सैफालियत की

सैफालियत की वजाहत से, वफ़ा करना क्यूँ छोड़ दूँ,
सोच कर जब मोहब्बत नहीं की, वफ़ा करना क्यूँ छोड़ दूँ,


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लिख्लियाते तरन्नुम

लिख्लियाते तरन्नुम में,
गौर से अब कुछ तो कहो,
लम्हा यूँ बीता जा रहा है,
कुछ तो तन्हाई में कहो,


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कुछ खिड़की

कुछ खिड़की से वो देख रही थी,
कुछ खिड़की से मैं देख रहा था,
कुछ वो सज सवंर रही थी,
कुछ में चाय पी रहा था,

इतने में उसकी नज़र पड़ी,
झट से हुई वो खड़ी,
न आव देखा न ताव देखा,
खिड़की को फटाक से बंद कर देखा,

मैं मायुश सा हुआ,
हल्की मुस्कान-सा लिए,
बैठ गया वही,
दिल अपना-सा लिए,

कुछ दिन बाद, फिर वही बात हुयी,
खिड़की खुली उसकी, मुलाकात हुयी,
मैंने नज़रें फेर लीं अब,
खिड़की अन्दर मोड़ ली अब,

अब खिड़की मेरी बंद रहती थी,
खुली अब उसकी रोज़ रहती थी,
मैं देखता था, ऊपर के कांच से,
वो झांकती थी, खिड़की की दारंच से,

एक दिन नीचे उतर रहा था,
बहन सामने से आ रही थी,
उसके पीछे वो भी आ रही थी,
 थोड़ी आँख मिली, सर नीच कर रहा था,

शाम का वक्त था,
अब वो रोज़ आने लगी,
बहन से याराना बनाने लगी,
पता नहीं दिल में उसके क्या था,


.

उसने देखा

उसने देखा, दूर से, तिरछी निगाहें करके,
पहचानने की कोशिश की, जोर दे करके,
यूँ ही घबडाहट में सुकून, दिल का छिन गया,
बात बन भी न पायी, पूरा दिन निकल गया,




.

सफ़र में

सफ़र में जब साथ हो, किसी हसीना का,
बैठ जाए पास, भीग जाए बदन पसीना का,


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मेरे आने

मेरे आने तक, वो न रुक सकी,
चली गयी, दो लफ्ज़ न कह सकी,
आंसूं भी बहे होंगे, दिल भी बैठा होगा,
न जाने वो इतनी देर क्यूँ कर बैठा होगा,


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यूँ नमक

यूँ नमक छिड़क दिया जख्मों पर, क्यूँ इतनी नफरत दिखाई,
ऐसा क्या गुनाह कर दिया, जो इतनी जली कटी सुनायी,


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तेरे इखिनियाते

तेरे इखिनियाते में,
अब खुतूत पेश करता हूँ,
है तू बहुत दूर,
तुझे ख़त से सलाम करता हूँ,


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मेरे अरमान

मेरे अरमान अब भी सुलगते हैं,
हवा न दो आग उलगते हैं,
दिल में छुपा रखे हैं,
ये शोले अब भी भड़कते हैं,


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रूहाले इम्जा

रूहाले इम्जा अब बात कर जा,
न यूँ खफा होकर जा,
कुछ दूर तो चलना है,
है आफ़ताब सा दामन,
न तू उधर जा,
न तू इधर जा,


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तुझे मह्ताबों

तब तुझे मह्ताबों से, महकता ये जहाँ दिखाई न देगा,
जब टूट जाएगा दिल तेरा, तुझसे कोई बेवफाई कर लेगा,

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Tuesday, September 13, 2011

चंद्रमुखी चौटाला


तेरे लट्ठ पन ने तुझे एक मुकाम दिला दिया |
तुझे सारे ज़माने में इस कदर चमका दिया |
तेरी अक्ल की दाद देता है यह जमाना | 
चंद्रमुखी चौटाला का भी है एक फ़साना || १ ||
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इतनी सफाई से केश को सोल्व करती हो |
की किसी को भी भनक नहीं लगने देती हो |
रुसवा नहीं होता कोई, ऐसा इन्साफ दिलाती हो |
अंदाज़ तुम्हारा निराला है, सबसे बड़े सलीके से पेश आती हो ||२ ||
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इस तरह तू मुझे न देख, मुझे तुझसे लगता है डर |
बात सिर्फ इतनी सी नहीं है, दिल का तो तू है समंदर |
पर तेरी आवाज़ और तेरे अंदाज़ से मुझे लगता है डर |
इज़हार तो करना चाहता हूँ, अपने दिल का मन्ज़र || ३ ||
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गुरुरे हुस्न, मैं तुझे ताकीद न कर पाया |

देखता रहा तुझे, तस्लीम न कर पाया |
खता माफ़ हो, या सजा दे दो |
पर नज़र न हटे तुझसे, ऐसी जगह दे दो || ४ ||
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वाह वाह ! ताबे हयात लग रही हो |

इस लिबास में भी, नूर-ए-हयात लग रही हो || ५ ||



दिल-ए-जज़्बात

ये दिल-ए-जज़्बात की बात थी, जो कहती थी कर देता था,
इश्क के जज़्बात में बहकर, तब नदी भी पार कर लेता था,
अब जबसे दिल टूटा है, बिखर-सा गया है, न सम्भलता है,
रोज़-रोज़ टुकड़े बीन यूँ इकठ्ठा करता हूँ, खून निकलता है,

पर अब जज्बा लाना हो तो, नया दिल चाहिए, पुराना न पिघलता है,
रोज़-रोज़ कितना ही आग में तापों आसुओं से फिर वो ठण्डा होता है,

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बाज़ार में


बाज़ार में चिल्ला-चिल्ला कर, यूँ न बेच अपने जख्मों को,
हिस्सा किसी और का भी है, तेरे इन नगमों में,

क्या रूह न दुखती होगी उसकी,
जो तुने उसे सरे बाज़ार बेच दिया,
अपने उन पलों का सौदा जो तुने कर दिया,

गर न होती मोहब्बत,
न यूँ तू शायर बनता,
रह जाता यूँ ही जीता,
रोज़ गम को न पीता,

उसका भी तो कुछ सोच,
जो दिल पर रख पत्थर,
तेरे आसुओं में लाश-सी बनी,
तेरी यादों में बाहों में किसी की डली,

यूँ न गम दे उसे,
न सता यूँ अब उसे,
प्यार किया है उसे,
न ज़माने को बता उसे,

तुझे तेरी शायरी की,
दाद तो मिल जायेगी,
पर जमाना जब जान जाएगा,
वो शर्म-ओ-हया से मर जायेगी,

भले तू तखल्लुस रखता है,
न चेहरा तेरा दीखता है,
न आवाज़ तेरी आती है,
बस तू किताब लिखता है,

पर ये कौन-सा इन्साफ है,
अपनी मोहब्बत को बेचकर,
सरे बाज़ार बदनाम करता है,
और इनाम का हक़दार बनता है,

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तुम किताबें

यूँ गर तुम किताबें को पड़ना छोड़ दो मैं कुछ कहूं,
उतर जाए तेरे जिस्म में जहन में ऐसा कुछ कहूं,


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तारीफ़-ए-अंजुमन

तारीफ़-ए-अंजुमन लिफाफा न खोल अभी से,
बंद रहने दे, चन्द रोज़ में बात होने लगेगी दिल से,


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इत्तफाकन कोई

इत्तफाकन कोई मिल जाए तो,
जाहे जिज्बत में महक सी उठती है,
कुछ दूर वो चलती है,
कुछ दूर उसकी महक चलती है,


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Monday, September 12, 2011

शान-ओ-शिफस्त

शान-ओ-शिफस्त, ये वक्त अब मजबूर कर देता है,
रहना चाहता हूँ पास, मगर दूर कर देता है,

شان-و-شفاسٹ، یہ وکٹ اب مزبور کر دیتا ہے،
رہنا چاہتا ہوں پاس ، مگر دور کر دیتا ہے،

Shaan-O-Shifast, Ye Vakt Ab Mazboor Kar Deta Hai,
Rahna Chahta hoon Paas, Magar Door Kar Deta Hai,

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सारी सिदायफ्तें


सारी सिदायफ्तें भुला, तेरे पीछे-पीछे चला,
तू न जाने कहाँ खो गयी, मैं तुझे ढूडने चला,

ساری سدےافتیں بھلا، تیرے پیچھے پیچھے چلا،
تو نہ جانے کہاں کھو گیے میں تجھے ڈھوڈنے چلا،

Saari Sidayaften Bhula, Tere Peeche-Peeche Chala,
Tu Na Jaane Kahaan Kho Gayee, Main Tujhe Dhoodne Chala,

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Friday, September 9, 2011

धोखा ये

धोखा ये हुश्न का मिला,
बात कुछ भी न बनी,
दिल यूँ टूट गया,
वो अपनी भी न बनी,


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खुलूस-ओ-चमन

खुलूस-ओ-चमन से, महकती फिजा का,
दर एक-एक महके, हर इल्तजा का,


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छत पर

छत पर हमें खड़े थे,
आबो हवा भर रहे थे,
कोहनियाँ टेके हुए,
सहारा दीवार का लिए हुए,

सामने की सीडियों पर,
जल्दी-जल्दी चलता कोई ऊपर आया,
हाथ में कुछ खाने की चीज़ थी,
खाता-खाता ऊपर आया,

हम निहारते रहे, गौर से देखते रहे,
पहचानने की पुरजोर कोशिश करते रहे,
न तो यह इस घर में दिखी थी कभी,
शायद मेहमान बन कर आयी थी अभी,

उसे भी खुला आसमान अच्छा लगा रहा था,
उसे मुझे अनदेखा कर देखा था,
नीचे से आवाज़ आयी, मेरा मन जाने को न था,
धीरे-धीरे ताकते-ताकते, में नीचे उतरा था,


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नूर-ए-अख्लाहत

नूर-ए-अख्लाहत से, वजह न पूछो देर से आने की,
आकर उन्होंने बात तो रख ली, मेरे बुलाने की,


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इश्क परवाह

इश्क परवाह न करता है, किसी वजाहत की,
दरिया में उतर जाता है, परवाह नहीं हिफाजत की,


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गम के

गम के बाज़ार में खुसी मिल जाती तो,
पार में दरिया न करता, तू यही मिल जाती तो,


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संजीदा हुश्न

संजीदा हुश्न कितना, खूबसूरत लगता है,
आखों में हया, चेहरे पर नूर टपकता है,


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मेरे अरमान

मेरे अरमान अब भी सुलगते हैं,
हवा न दो आग उलगते हैं,
दिल में छुपा रखे हैं,
ये शोले अब भी भड़कते हैं,


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अब न

अब न करो वक्त से ये जुस्तजू,
बैठे रहने दो पहलू में, न करो गुफ्तगू,


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तब तुझे

तब तुझे मह्ताबों से महकता ये जहाँ दिखाई न देगा,
टूट जाएगा, दिल तेरा तुझसे कोई बेवफाई कर लेगा,

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तेरा चेहरा

तेरा चेहरा,
अब कितना बदल गया होगा,
तुझे देखे,
जमाना निकल गया होगा,
पास से भी, अब तू गुज़रे,
पहचान न पायें शायद तुझे जान न पायें,
पर रूह कहती है,
मैं पहचानती हूँ, रूह उसकी,
तू न फ़िक्र कर,
पर अब उसको रहने दे,
किसी और की रूह की बनकर,


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गम तो

गम तो शायद,
फ़ना न हो सका,
हम फ़ना हो गए,
वो सब कह सका,


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शमाँ ने

शमाँ ने सताया सबको,
पास बुलाकर जलाया सबको,
परवानों के जिस्म से,
लौ को अपनी बढाया जबसे,

तभी तो शायद,
ये शमायें इतनी चमकती हैं,
परवानों की रूह से,
इनकी रूह चमकती है,

इतराती हैं, बलखाती हैं,
परवाने गर न जलें,
ये तो कब की,
बुझ जाती हैं,

शुक्र है परवानों का,
उपकार इन पर कर जाते,
इनकी मोहब्बत में,
जिस्म अपना सौंप जाते,


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हमसफ़र हैं

हमसफ़र हैं अब,
ठुकराए हुए दीवाने,
कोई कुछ न कहता है,
सब के सब परवाने,


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आसुओं की

आसुओं की स्याही में डुबोकर,
अपना जिन्दगीनामा लिखा,
दिखाई उसे ही देगा,
जिसने इस तरह बेवफाई का गम झेला,


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