बुधवार, 17 मार्च 2021

गुमराह न

 

गुमराह न कर उम्मीदों को,
आस इस दिल में रहने दे ।
अभी तो झलक मिली है,
कुछ तो दिल की कहने दे ।

 

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है दबे पाँव

 

है दबे पाँव चले आना,

मेरी महफिल उरूज़ पर है ।

कुछ देर बैठकर जाना,

तेरी सहफिल दरूज़ पर है ।

 

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ता पसंद

ता पसंद,
यह जिक्र-ए-इनायत रहेगा ।
जमीं भी कहेगी,
आसमां भी कहेगा ।

 

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है मसगून

 

है मसगून,
कि तौबार-ए-अलम करता हूँ ।
तुम बैठी रहो इसी तरह,
मैं अलम-ओ-आराम करता हूँ ।

 

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वो जबाब-ए-हक

 

वो जबाब-ए-हक माँग सकते हैं कैसे,
जब रुसवाइयों के आँसू बह चुके हैं ।
गुमसुम बैठे हैं भरे बाजार-ए-शोरगुल में,
अब सारे जहाँ में बेरोराईयाँ खो चुके हैं ।

 

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यह आशिकों

 

यह आशिकों की महफिल है जनाब,
यहाँ तनहाइयाँ मिला करती हैं ।
रुसवाइयाँ मिला करती हैं,
आशिकों को कहाँ शहनाईयाँ मिला करती हैं ।

 

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अब अफसाने

 

अब अफसाने बयाँ नहीं होते,
तह-लो जुबान में मेरी ।
अब कहानियों ने कह दिया है,
न करो तरफदारी मेरी ।

 

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जद्दोजहद की

जद्दोजहद की कशमश में,

जिन्दगी की रवानियाँ गईं ।

यही इसकी, यही उसकी,

हम सबकी कहानियाँ भईं । 

 

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हैं जुनूँ, कि

 

 

हैं जुनूँ, कि फ़ख्त,

ख्वाईशें पूरी हों ।

चाहे जिसकी भी हों,

पर ख्वाईशें पूरी हों ।

 

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खामोश कदम उनके भी हैं

 

खामोश कदम उनके भी हैं

 

खामोश कदम उनके भी हैं,
खामोश कदम मेरे भी हैं ।
खामोशियाँ मंजर में छाईं हैं,
न किसी ने नज़र मिलाई हैं ।

कदम मेरे उठ न रहे हैं,
वो भी धीरे.......धीरे चल रहे हैं ।
दोनों के दिल पर बोझ है,
दोनों इसे समझ रहे हैं ।

वो राह अपनी पकड़ रहे हैं,
मैं राह अपनी पकड़ रही हूँ ।
उनकी मजबूरियाँ मुझे पता हैं,
मेरे मजबूरियाँ उन्हें पता हैं ।

बस आखिरी मिलन को आए थे,
बुझे हुए दिलों को लाए थे ।
कुछ देर खामोशी में गले लगाए थे,
दिल ही दिल में रोए थे ।

 

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शनिवार, 20 फ़रवरी 2021

पप्पू परिहार की नज्मे ग़ज़लें_पप्पू परिहार बुण्देलखण्डी


 

पप्पू परिहार की शेर-ओ-शायरी_पप्पू परिहार बुण्देलखण्डी

 


आगे से ख्याल है

 

आगे से ख्याल है,

भी नहीं कोई मलाल का,

जिन्दगी को बेनियात,

किया किसी मकाल का ।

 

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रूहों के साये

 

रूहों के साये

 

रूहों के साये,
कभी साथ नहीं छोड़ते ।
अपनी मौजूदगी के,
एहसासों से खुदको जोड़ते ।

रोंगटे खड़े हो जाते,
जब आस.......पास रूहों के साये होते ।
जहन को झनझना जाते,
जब रूहों के साये जिस्म में समा जाते ।

हो अहसास किसी की मौजूदगी का,
उसके जिस्म के जाने के बाद ।
वही तो साये रूहों के,
जो किसी और को नजर नहीं आते ।

रूहानियत का आलम यही है,
जिस्म के जाने के बाद भी,
अपनों का ख्याल रखती है ।
रूह से रूह को पकड़े रखती है ।

 

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