Saturday, August 20, 2011

फलसफा-हुश्न


फलसफा-ए-हुश्न का, तेरे अफसाने से शुरू होगा |
तू ख़ूबसूरत इतनी है, कि जमाना तेरे हुश्न का कायल होगा |
उस पर तेरी सोखी का आलम, इस कदर समां गया है |
तू महफूज़ रहे, तेरे भीतर खुदा का नूर
गया है || १ ||

मुर्बते हुश्न, कि तेरे दायरे से, न निकल पायेंगे |
मर जायेंगे, मिट जायेंगे, तुझे खुश कर जायेंगे || २ ||

खुश है जमाना तेरे दीदार से, क्यूँ तू छिपा रही है अपने हुश्न को |
दुआयें देंगे तुझको,
ज़माने कि नज़रों से गुजरने दे, अपने हुश्न को || ३ ||

छुरियां चल जाती हैं, सरे बाज़ार तेरे हुश्न कि खातिर |
दोस्तों मैं भी जंग, छिड जाती है तेरे हुश्न कि खातिर |
तेरे हुश्न पर जवानी इस कदर छाई है |
तू बस मेरे लिए ही, इस दुनिया में आयी है || ४ ||

बदस्तूर तेरा यह जुल्म, हम सह न सके |
अब तो दीदार करा दे, तेरे बिना हम रह न सके || ५ ||

तुझे देखे जमाना हो गया |
मस्ताने से तेरा दीवाना हो गया |
पल-पल तेरी याद में |
दर-दर भटकने वाला बेगाना हो गया || ६ ||
 

.


No comments:

Post a Comment