चन्द इशहार
इश्क में हारे हुए के, चन्द जख्म, कुरेदते रहते हैं, न लगाते मरहम,
रविवार, 28 अगस्त 2011
चाँद से
चाँद से क्यूँ पूछते हो, चिरागों को क्यूँ जलने दें,
रौशनी तेरी है बहुत, बैरागों को क्यूँ मचलने दें,
.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
नई पोस्ट
पुरानी पोस्ट
मुख्यपृष्ठ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें