Thursday, July 7, 2011

दिया हुश्न

दिया हुश्न तुझे, इतना क्यूँ इतराती है |
जानिब देख तेरे, कलियाँ अभी से बल खाती हैं |

6 comments:

  1. बहुत ही अच्छा लिखा है.

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  2. शुक्रवार को आपकी रचना "चर्चा-मंच" पर है ||
    आइये ----
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. सुंदर प्रयास ...आशा है आप इसे यूँ ही बनाये रखेंगे ....आपका आभार

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  4. आप लिखते बहुत अच्छा है ..लेकिन थोडा सा ब्लॉग की सेट्टिंग कर लें ....बढ़िया रहेगा ...अगर कोई समस्या आती है तो मुझे मेल पर सूचित कर दें ...!

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  5. आपकी रचना काफी अच्छी लगी ....आगे भी लिखते रहिये

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