चन्द इशहार

इश्क में हारे हुए के, चन्द जख्म, कुरेदते रहते हैं, न लगाते मरहम,

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

कुछ ताबीर करने

कुछ ताबीर करने को दिल अब करता नहीं,
बुझा-बुझा सा रहता है, अब जलता भी नहीं,

.
प्रस्तुतकर्ता Pappu Parihar Bundelkhandi पर 4:22 pm कोई टिप्पणी नहीं:
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लेबल: कविता कौशिक, ग़ज़ल, नज़्म, पप्पू परिहार, शेर, Gazal, Pappu Parihar, Sher
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